भारत का इतिहास

इतिहास के तीन भाग है
1.      प्राचीन इतिहास 2.  मध्य इतिहास 3. आधुनिक इतिहास



1. प्राग इतिहास इसमें लिखित साक्ष्य उपलब्ध नही है। पुरातत्व के आधार पर आकलन किया गया है।

2. आदि इतिहास इसमें लिखित साक्ष्य उपलब्ध है पर ओ अपठनीय है। जैसे हड़प्पा की सभ्यता, वैदिक सभ्यता

पाषाणकाल → 1 पुरा पाषाण काल 2. मध्य पाषाण काल 3. नव पाषाण काल

1.    आग का अविष्कार पुरा पाषाण कालमें हुआ पर इसका प्रयोग नव पाषाण काल में आरम्भ हुआ।

2.    पहिये का अविष्कार मध्य पाषाणकालमें हुआ।

3.    पाषाणकाल की व्यवस्था आखेट पर निर्भर थी इसलिये इसे पाषाण काल कहा गया।

आदि इतिहास

हडप्पा की सभ्यतामानव ने सर्व प्रथम कांसा का प्रयोग किया इस सभ्यता को कांस युगीन सभ्यता कहा गया।

कांसा कापर+टिन से मिलकर बना होता है।

सिन्धु घाटी की सभ्यता को ही हडप्पा की सभ्यता कहा जाता है।

ट्रिक

HARRAPPA

H हरिरूपिया ऋगवेद
R राम दयावान दयाराम साहनी1921ई. में
R रावी नदी के बायें तट पर
P पाकिस्तान
P पश्चिमी पंजाब के माण्डगोवरी जिले में।

विर्टन बन्धु ने हडप्पा सभ्यता को 1853 में लाहौर से करांची रेल लाइन बनाते समय सबसे पहले देखा

1904 में पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई थी इसकी स्थापना लार्ड कर्जन ने की थी।

मोहनजोदड़ो इसकी खोज रखालदास बनर्जी ने 1922 में किया

यह पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के किनारे स्थित था।
यहां से निम्न साक्ष्य मिले है।

1 सूती वस्त्र का साक्ष्य 2 मलेरिया  के साक्ष्य 3 14सेमी कांसरूपी नित्यागना की मूर्ती 4 एच आकार की समाधि 5 अन्न का साक्ष्य 6 वृहद स्नानागार जिसमें उत्तर और दक्षिण सीढ़िया थी।
इसका नेतृत्व मार्सल ने किया था।

इसका विस्तार तीने देशों में है। भारत ,पाकिस्तान ,अफगानिस्तान

अफगानिस्तान में दो स्थल मिले है। 1 सोतगुर्द 2. मुण्डीगाक

भारत के सात राज्यो में है।

ट्रिक JUMPGHR

शब्द
प्रदेश
स्थान
नदी
J
जम्मूकश्मीर
माण्डा
चिनाब
U
उत्तर प्रदेश
मेरठ आलमगीर
हिण्डन
M
महाराष्ट
दैमाबाद
गोदावरी
P
पंजाब
रोपड़
सतलज
G
गुजरात
लोथल
भोगवा
H
हरियाणा
बनावली
सतलज
R
राजस्थान
कालीबंगा
घाघरा
लोथलबन्दरगाह के साक्ष्य मिले है। यहां पर जो शवो को एक साथ दफनाने का साभ्य भी है। यहां पर चावल के साक्ष्य मिले है।

बनवलीजुते हुए खेत के साक्ष्य मटर और चना बोने के साक्ष्य

कालीबंगामिट्टी के हल तथा ऊंट की हड्डी के साक्ष्य भी मिले है।और यहीं पे सरस्वती नदी भी पहले बहती थी जो अब बिलुप्त हो चुकी हैं। अग्नि कुण्ड का साक्ष्य यहीं से मिला है।

सिन्धघाटी सभ्यता का क्षेत्रफल तथा व्यस्थाइसका क्षेत्रफल 1299600 वर्ग किमी में फैला हुआ है। तथा इसका आकार त्रिक्षुजाकार है।

यहां की व्यस्था नगरीय थी।

यहां का परिवार मातसातत्मक था यहां हर घर में देवियो/मातृ की मूर्तियां मिली है।
यहां की लिखावट दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।

घरो के दरवाजे तथा खिड़किया पीछे की ओर खुलते थे केवल लोथल ऐसा नगर था जहां पर दरवाजे सड़क की दिशा में खुलते थे।

यहां की मुख्य फसल गेंहू तथा जौ थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता का पतन

1.    नदियो के बाढ़ के कारणइसको बताने वाले इतिहास कार है।

जान मार्सलमोहनजोदड़ो
जानमैकेलोथल

2.    बाह्य आक्रमण आर्यो का हुआ था जिसे बतान वाले निम्न है।

1.    स्टुवर पिग्गट 2. चाइल्ड 3.ह्लीर

                           आर्य

आर्यो की पवित्र पशु गायथी। तथा पालतू पशु घोड़ा था।

आर्यो का समाज पुरुष प्रधान था, आर्या का मुख्य पेशा पशुपालन था।

सिन्धुघाटी सभ्यता का प्रिय पशु बैल(कूबड़ दार) था। तथा मोहरो पर एक सींध वाला बैल का चित्र का अंकन होता था।

संस्कृत
1.     सामाजिक पृत सत्तातमक सयुक्त परिवार मांसाहारी जौ(प्रमुख पदार्थ) शाकाहारी ऊनी वस्त्र आभूषण

2.     आर्थिक पशुपालन , लकड़ी का हल, उत्पादन कम

3.      धार्मिकगाय की पूजा, वृक्ष की पूजा मूर्ति की पूजा

4.      राजनैतिकपरिवार का मुखिया कुलप कहलाता था।

आर्यो का मुख्या देवता इन्द्र थे जिन्हे पुरुन्दर किलो को तोड़ने वाले कहा जाता था।
सिन्धुघाटी सभ्यता की संस्कृत(30 से 1700ई.पू. तक)

1.    R7 आकार का कब्रिस्तान

2.    पालतू जानवर कुत्ता

3.    हवन कुण्ड

4.    परिवार की मुखिया महिला थी

5.    संयुक्त परिवार

6.    पवित्र नदी सरस्वती नदी

7.    प्रसिध्द नदी सिन्धु नदी

वैदिक सभ्यताइसे आर्यो की सभ्यता भी कहा जाता है।

वेद(ज्ञान) को अन्य नामो से भी जाना जाता है।

1.    श्रुति 2. अपरिषय 3. संहिता

पुराणों की संख्या 18 है।
वेदांक 6 है।

उपनिषद 108 है।

वेद 4 है।
1.
                     ऋगवेद 2. सामवेद 3. अर्थवेद 4. सामवेद

सबसे पुराना वेद ऋग वेद है।

पुरोहित को वेदो को पढ़ने वाला कहा जाता है।
अरण्यक को जंगल में एकांत स्थान पर ज्ञान प्राप्त करने वाले को कहा जाता है।
वेदों को ज्ञान कराने वाले को ब्राम्हण कहते है।
1.                ऋगवेदइसमे 10मण्डल 1028सूक्ति 10580मन्त्र हैं।
गायत्री मंत्र का उल्लेख ऋगवेद के तीसरे मण्डल में किया गया है। यह मंत्र सूर्य देवता को सर्मपित है।
10 वे मण्डल के पुरू में शूद्र जाति का उल्लेख किया गया है
ऋगवेद विस्वामित्र व्दारा रचित है।
इसमें इन्द्र के लिये 250 तथा अग्नि के लिये 200 ऋचाओं की रचना की गयी है।
वैदिक सभ्यता को दो भागो में बाटा गया है।
1.     पूर्व वैदिक (1500 से 1000 ई.पू.) 2. उत्तर वैदिक(1000 से 600 ई.पू.)

2.     सामवेद इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।
यह गाई जा सकने वाली ऋचाओ का संकलन है।
3.     अर्थवेदयह अर्थवा ऋषि व्दारा लिखा गया है।
इसमें रोगों के लिये औषधियों का वर्णन किया गया है।
4.   
              यर्जुवेदयह एक ऐसा वेद है जो गद्य तथा पद्य दोनो में है। इसके पठ्यकर्ता को उद्रातृ कहते है।
वेदो के अन्तिम भाग को वेदान्क कहते है।
वेदान्क कुल मिलाकर 6 है→1. ज्योतिष 2. व्याकारण 3. शिक्षा 4. निरुक्ति 5. कल्प 6. दन
धार्मिक आन्दोलन के कारणलोहे की खोज, प्रयाप्त अनाज का उत्पादन कर्मकाण्ड की प्रबलता।
                          जैन धर्म
ऋषभदेव जैन धर्म के संस्थापक तथा पर्वतक थे। जिनका प्रतीक चिन्ह बैल था। यह शब्द जीन धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है विजेता परन्तु इसके वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी थे।

जैन धर्म में 24 तीर्थकार हुए है। इन 24 तीर्थकारों में मात्र एक महिला तीर्थकार है। जिसका नाम मल्लिनाथ तथा इसका प्रतीक चिन्ह सिर पे धारण कलस है।

जैन धर्म के 23वे तीर्थकार पारसनाथ हुए जिनका जन्म काशी में हुआ था। तथा इनका प्रतीक चिन्ह सर्प का फन है।

जैन धर्म के 24वे तथा अन्तिम तीर्थकार महाबीर स्वामी हुए जिनका प्रतीक चिन्ह सिंह था।

पाश्वर्नाथइनके पिता का नाम अश्वेशन था। इनकी माता का नाम वामा था। इनका जन्म काशी में हुआ था इनका प्रतीक चिन्ह बैल है। इन्हे 83 दिन तपस्या के बाद 84वे दिन ज्ञान प्राप्त हुआ। इनके प्राप्त ज्ञान को महाब्रत कहा गया है। जो कि निम्न है।
1.    सत्य के मार्ग पर चलना
2.    अहिंसा के मार्ग पर चलना
3.    अस्तेप (चोरी न करना)
4.    अपरिग्रह(अतिरिक्त धन का संचय न करना)
महाबीर स्वामीइनका जन्म 599ई.पू. वैशाली के कुण्डग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। इनके पिता का नाम सिध्दार्थ तथा माता का नाम त्रिसला था। इनके पत्नी का नाम यशोधरा था। इनकी पुत्री का नाम अणोज्या था जिसे प्रियदर्शनी भी कहा गया जो कि इनकी पहली शिष्या कहलाई। इनके दमाद का नाम जमालि था जो कि इनके पहले शिष्य थे। इनके बड़े भाई का नाम नन्दिवर्धन था। इन्होने 30 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग किया तथा विपुलाचन पहाड़ी पर जो कि पराकर नदी के तट पर स्थित है 12 वर्षो तक कठिन तपस्या की तब इन्हे ज्ञान प्राप्त हुआ। इनके ज्ञान को पांच महाब्रत कहा गया है। जो कि निम्न है।
1.    ब्रम्हचर्य रहना
2.    सदा सत्य बोलना
3.    अहिंसा के साथ जीना
4.    अस्तेप (चोरी न करना)
5.    अपरिग्रह(अतिरिक्त धन का संचय न करना)
इनके त्रिरत्न है 1.ज्ञान 2. दर्शन 3. चरित्र/आचरण
इन्होने क्रिया माणक्रत का सिध्दान्त दिया इसमें सोचने पर दण्ड और पुरस्कार दिये जाने का उल्लेख है।
बहुरताबाद का सिध्दान्त इनके दमाद व शिष्य जमालि ने दिया जिसमें कार्य़ के आधार पर पुरस्कार तथा दण्ड का उल्लेख है।

                        जैन संगीतिया

1.      प्रथम जैन संगीति यह 322 से 323 ई. हुई जिस समय शासक चन्द्रगुप्त मौर्य था। इसके अध्यक्ष स्थूलभद्र थे। इसका परिणाय यह हुआ कि जैन धर्म दो सम्प्रदाय में बट गया पहला दिगाम्बर(इसमें लोग कपड़े पहनते थे) जिसके अध्यक्ष स्थूलभद्र हुए तथा दूसरा श्वेताम्बर कहलाया जिसमें लोग बिना कपड़े के रहते थे इसके अध्यक्ष भद्रबाहु हुए। यह पाटिलपुत्र नामक स्थान पर हुई थी।
2.     व्दतीय जैन संगीत 512-13 में हुई थी। जिसके अध्यक्ष देवार्षि क्षमाधरण  जी थे यह पुलकेशिन व्दतीय के कार्यकाल में हुई थी। यह गुजरात नामक स्थान पर हुई थी। इसका परिणाय यह हुआ कि 14 के स्थान पर 12 साहित्य हो गये।
अनेकान्तवाद, भेदभद, त्यागवाद, शब्दभंगी सिध्दान्त य सभी जैन धर्म से सम्बन्धित है।
चन्द्रगुप्त की मृत्यु श्रवणबेलगोला में उपवास के कारण हुई थी।

                       बौध्द धर्म

इसके संस्थापक गौतम बुध्द थे  गौतमबुध्द (563 से 483 ई.पू.)
जन्म→ 563ई.पू. लुम्बनी में
बचपन का नामशिध्दार्थ
पिता का नामशुध्दोधन
माना का नाममायादेवी
पुत्र का नाम राहुल
पत्नी का नाम यशोधरा
मृत्यु→ 483ई. कुशीनारा में
इनके जीवन में वैशाख पूर्णिमा का बहुत महत्व है क्योकि इसी दिन इनका जन्म हुआ, इसी दिन ज्ञान प्राप्त हुआ तथा इसी दिन इनकी मृत्यु भी हुई।
इनकी जन्म के सात दिन बाद इनकी माता माया देवी की मृत्यु हो जाती है।
इनका पालन पोषण इनकी मौसी/शौतेली मां गौतमी ने किया
इनका विवाह 16वर्ष की उम्र में यशोधरा के साथ हुआ।
य़शोधरा शाक्य कुल की स्त्री थी।
इनके सारथी का नाम चन्ना तथा घोड़े का नाम इन्दर था जिसके साथ इन्होने पहली बार नगर के भ्रमण को निकले।
यात्रा पर इन्होने बारी बारी से ये चीजे देखी
पहला दिनवृध्द को देखा जिससे उनके दुख हुआ
दूसरा दिनइन्होने बीमार व्यक्ति को देखा
तीसरा दिनइन्होने मृतक का दृश्य देखा।
चौथा दिनसन्याशी का दृश्य़
29 वर्ष की अवस्था में इन्होने गृह का त्याग कर दिया
इनको 6 साल की कठोर तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ अर्थात इन्हे 35 वर्ष की उम्र में ज्ञान प्राप्त हुआ।
गौतम बुध्द के पहले गुरु अलारकलाम हुए।
इन्होने पूर्वबेला में 5 सह ऋषी के साथ तपस्या किया पर ज्ञान नही मिला।
सुजाता नामक शैन्य अधिकारी की लड़की की खीर खाई
गया नामक स्थान पर साल बृक्ष के नीचे 7तवे दिन इन्हे वैशाख की पूर्णिमा को ज्ञान प्राप्त हुआ।

इन्हे निम्न ज्ञान प्राप्त हुआ
1.     संसार दुखो से भरा है।
2.     इन दुखो को दूर किया जा सकता है।
3.     इस दुख का कोई न कोई कारण है।
4.     दुख निरोध प्रदिपथा है।
इन्होने अपना पहला उपदेश तपस्वू और भल्ले नामक शिष्य़ो को दिया
इन्होने अपना पहले उपदेश अपने 5 मित्रो  को सारनाथ में दिया। इसे धर्म चक्र परिवर्तन कहा गया।
वर्षावासबरसात के समय किये गये विश्राम को वर्षावास कहा गया सर्वाधिक इन्होने श्रावस्ती में विश्राम किया
अम्रपाली वैशाली की नगर बधू थी अम्रपाली और बुध्द के बीच शास्तार्थ वैशाली में हुआ।
गौतम बुध्द के सबसे प्रिय शिष्य आनन्द थे।
सबसे पहले बौध्द धर्म में प्रवेश करने वाली इनकी सौतेली मां गौतमी थी।
दूसरी महिला शिष्य अम्रपाली थी। जो कि वैशाली की नगर बधू थी।
गौतमबुध्द का भाई देवदत्त था।
उस समय मगध का राजा आजादशत्रु था।
बुध्द का अगला अवतार मैत्रनाथ के रूप में होगा।
नागार्जुन नें शून्यवाद का शिध्दान्त दिया।
मैत्रेनाथ ने विज्ञानवाद का सिध्दन्त दिया।
गौतम बुध्द के पुराने जन्मो की कहानी जातक कथाओ में वर्णित है।
बौध्द धर्म के त्रिपटक है 1. सूतपिटक 2. विनयविटक 3. अभिधम्य पिटक
बौध्द धर्म के त्रिरत्न है1. बुध्द 2. संघ 3. धम्य
सूकरदाव को खाने से महात्मा बुध्द की मृत्यु कुशीनारा में हुई इनकी मृत्यु को बौध्द धर्म में महापरिनिर्माण कहा गया।

                      बौध्द संगीति

ट्रिकराजा ने वैशाली को पटाकर कश्मीर के कुण्डलवन में घुमाया अकाअकके साथ
क्रम सं.
स्थान
शाशक
समय
अध्यक्ष
परिणाम
प्रथम
राजा
आजादशत्रु
483 ई.पू.
महाकश्यक
सूतपिटक विनयपिकट
व्दतीय
वैशाली
कालाशोक
383 ई.पू.
साबकमीर
स्थवीर महांघीकि
त्रितीय
पटालिपुत्र
अशोक
1ई.
मोगलीतिष्य पुत्र
अभिवदूम विटक
चतुर्थ
कश्मीर के कुण्डलवन
कनिष्क
251 ई.
वसुमित्र
हीनयान महायान
पंचम
कन्नौज
हर्षवर्धन
उपलब्ध नही
उपलब्ध नही
उपलब्द नही

 विभन्न धर्म के पर्वतक

धर्म
प्रवर्तक
वैष्णव धर्म
भगवान विष्णु
शैव धर्म
भगवान शिव
भागवत धर्म
कृष्ण भगवान
                        भागवत धर्म  
 प्रवर्तक श्री कृष्ण
पिता वासुदेव
माता   देवकी
निवासी मथुरा
गुरू     घोरआंगिरस
कृष्ण के भक्त को उपासक कहा गहा गया।
नारायण के उपासक को पंचरात्रिक कहा गया।
विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख ऋगवेद में किया गया है।
कृष्ण को पूजे जाने की जानकारी पाणिनीकृत के अषटाध्यायी से मिलती है।
विष्णु के उपासक को अलवार कहा जाता था।
भागवत धर्म के सिध्दान्त
भक्ति मोक्ष प्राप्ति का साधन है।
भक्ति के 9 प्रकार है जिन्हे भगवान विष्णु का रूप कहा गया है।
विष्णु के 10 अवतार निम्न है।
1.     मत्सय 2. कूर्ण अथवा कच्छप 3. वाराह 4. नृसिंह 5. वामान 6. परशुराम 7. राम 8. बलराम 9. बुध्द 10. कल्कि या कालि
अवतार का सर्वप्रथम उल्लेक गीता में किया गया है।
सबसे लोकप्रिय अवतार वाराह
अन्तिम अवतार बुध्द का
आने वाला अवतार कल्कि का है।

विभिन्न गुरू तथा उनके सिध्दान्त

गूरू
सिध्दान्त
शंकराचार्या
अदैत्यवादी का सिध्दान्त
रामानुजाचार्य
विषिटता दैत्व वाद का सिध्दन्त
बल्लभाचार्य
शुध्दतावाद, पुष्टिवाद का सिध्दान्त
तुकाराम
वारकरी सम्प्रदाय का सिध्दान्त
निम्काचार्य
सनक सम्प्रदाय की स्थापना
                       16 महा जनपद

16 महाजनपदो का उल्लेख जैन ग्रन्थ में अंगोत्तर निकाय से तथा वौध्द ग्रन्थ में भगवतीशूत्र से मिलता है।
16 महाजनपद में से 8 उत्तर प्रदेश में स्थित है।
इन जनदो के नाम तथा उनकी राजधानी निम्न है।
गंगा घाटी में 10 महाजनपद स्थित है।
महाजनपद
राजधानी
विशेष
अंग
चम्पा
सबसे पूर्वी स्थल
मगध
राजगृह(ऋवज्ज)
काशी
वराणसी
उत्तर प्रदेश
कोशल
अयोध्या(साकेत)
उत्तर प्रदेश
वत्स
कौशाम्बी
उत्तर प्रदेश
वज्जिसंग
वैशाली
अवन्ति
उज्जैन महिष्मती
मल्ल
पावा(पडरौना)
उत्तर प्रदेश
सूरसेन
मथुरा
उत्तर प्रदेश
मत्सय
विराटनगर
गन्धार
तक्षसिला
कम्बोज
हाटक
चेदि
सूतवधि
उत्तर प्रदेश वुन्देलखण्ड
पंचाल
अक्षत्रपुर
कुरू
इन्द्रप्रस्थ
दिल्ली
गन्धार
तक्षशिला
16 महाजनपदो में 4 प्रमुख राजतंत्र निम्न है।
1.     कोशन 2. वत्स 3. मगध 4. अवन्ति

मगध का राजउत्कर्ष
हर्यक वंशबिम्बिशार(पहला शासक)आजादशत्रुउदयिन(अन्तिम शासक)
शिशुनाग वंशशिशुनाग(पहला शासक)कालाशुर(अन्तिम शासक)
नन्द वंशमहापदमनन्द(पहला शासक)घनानन्द(अन्तिम शासक)
मौर्य वंशचन्द्रगुप्त मौर्य(पहला शासक)

भारत का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालयतक्षशिला विश्वविद्यालय

चन्द्रगुप्त मौर्यचन्द्रगुप्त मौर्य की माता व्दारा उसे एक ग्वाले को बेच दिया गया था।
चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को जाते समय राजकिलम नामक खेल देखता जो राजा और चोर वाला खेल होता था।
इसने चन्द्रगुप्त के बारे में पता करके ग्वाले से इसे खरीद लिया।
इसके पहले चाणक्य घनानन्द के राज्य में ज्योतिष था। वहां पर घनानन्द व्दारा खराब व्यवहार करने के कारण राज्य से निकल जाता है। और चेतावनी देता है कि उसे इक दिन बरबाद कर देगा।
घनानन्द मगध का राजा था इसकी राजधानी राजगृह थी।
चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मिलकर सेना का गठन किया जिसमें लड़ाकू जातिया, शस्त्र बनाने वाली सेना थी
चन्द्रगुप्त मौर्य ने सबसे पहले राजगृह पर आक्रमण किया जिससे इसे हार का सामना करना पड़ा।
फिर इसने मगध के सीमावर्ती क्षेत्रो पर आक्रमण किया वहां कि जनता  घनानन्द से दुखी थी इसलिये उन लोगो ने चन्द्रगुप्त का साथ दिया जिससे चन्द्रगुप्त मौर्य को सफलता मिली और इसने घनानन्द की हत्या करके मगध का राजा बना।
चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री चाणक्य था इसने अर्धशास्त्र नामक पुस्तक लिखी जिसमें राजनीति से सम्बन्धित ज्ञान दिया गया है।
भारत का सबसे पुराना विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्याल था जिसमें चाणक्य ने अध्ययन किया था।
305 ई.पू. चन्द्रगुप्त ने सिकन्दर के राज्य पर हमला कर दिया। सिकन्दर का सेनापति सेलुकस निकेटर था जिसने चन्द्रगुप्त मौर्य से युध्य किया और हार गया।
सेलुकस निकेटर का राजदूत मेगस्थनीज था जिसने इण्डिका नामक पुस्तक लिखी जिसमें भारत की यात्रा के बारे में विवरण दिया गया है।
चन्द्रगुप्त मौर्य नें सेलुकस निकेटर की पत्री हेलना से विवाह किया तथा इसने निकेटर को पसन्द 500 हाथी दान में दिये और इसें पांच राज्य दहेज में मिले।
चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत को एक बनाने वाला प्रथम शाशक कहा जाता है।
चन्द्रगुप्त मौर्य ने भोजन करते समय पत्नी के मागने पर उसे अपना जूठा खाना देता है जिसे खाने से उसके पत्नी की मृत्यु हो जाती है। तथा आपरेशन के जरिये विन्दुसार का जन्म होता है।
चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु श्रवणवेलागोला में संलेखना विधि से हुई
विन्दुशार के बाद अशोक राजगद्दी पर बैठा।

                     अशोक(273-269ई.पू.)

अशोक को उसके कार्यो के कारण अशोक महान कहा जाता है।
इसे अभिलेखों का पिता कहा जाता है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण युध्द कलिंक का युध्द(261ई.पू.) माना जाता है। जिसमें 1लाख लोग मारे गये 1लाख लोग घायल हुये और इतने ही लोग बन्दी बना लिये गये।
कलिंग के युध्द के बाद अशोक ने कभी न युध्द करने की कसम खाई और बौध्द धर्म अपना लिया।
कलिंग नामक स्थान उड़ीसा में स्थित है।
इसने कलिंग के युध्द के दासवे वर्ष बोध गया की यात्रा की।
20वे वर्ष लुम्बनी की यात्रा की जिसके बाद इसने भूराजस्व कर को 1/24 भाग माफ कर दिया इसकी जानकारी इसने लूमनदेवी अभिलेख में देता है।
इसने 14शिलालेख 07स्तम्भलेख 84000स्तूपो का निर्माण करवाया है।
इसे धर्मनिरपेक्ष शासक भी कहा जाता है।
                                         दिल्ली सल्तनत

दिल्ली सल्तनत ने नाम इस प्रकार है

वंशक
संस्थापक
सन
अन्तिम शासक
अन्तर
गुलाम वंश
कुतुब्द्दीन ऐबक
1206-1290
84
खिलजी वंश
जलालुद्दीन खिलजी
1290-1320
30
तुगलक वंश
गया शुद्दीन तुगलक
1320-1414
94
सैयद वंश
खिज्र खाँ
1414-1450
36
लोधी वंश
बहलोल लोधी
1450-1526
76
                 गुलाम वंश(1206-1290)
कुतुब्बुद्दीन ऐबक(1206-1210)इसें गुलाम वंश का संस्थापक कहा जाता है।
इसको कुरान याद होने के कारण कुरानखवा के नाम से जाना जाता है।
इसे लाखो में दान करने वाला लाखबक्श कहा जाता था।
इसने अपनी  काकी की याद में कुतुबमिनार की नीव रखी जिसे इल्तुतमिस ने पूरा करवाया
इसकी राजधानी लाहौर थी।
इसने ढाई दिन के झोपड़े का निर्माण अजमेर में करवाया
इसे भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक माना जाता है।
इसकी मृत्यु चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर हुई।
इसने अपने उत्ताराधिकारी इल्तुतमिस को दास के रूप में खरीदा था।
यह उदार ह्दय व शासन के प्रति कठोर था।
इल्तुतमिश(1210-1236) इसने कुतुबमिनार को पूरा करवाया
यह ऐबक व्दारा खरीदा गया दास था।
ऐबक के बाद आरामशाह गद्दी पर बैठा जिसकी हत्या इल्तुतमिस ने की। और फिर शासक बना
इसे दलित चलीसा(तुर्क ए चिहलगामी) का निर्माण किया
इसने इकता प्रथा को शुरू किया इस प्रथा में तनख्वाह के बदले जमीन दी जाती थी।
ऐबक की मृत्यु के समय यह बदायूं का सूबेदार था।
इसने शुध्द अरबी के सिक्के जारी करवाये जिसमें चांदी का टंका तथा तांबे के जीतल
इसने अपनी राजधानी लाहौर से स्थान्तरित कर दिल्ली में किया इसका मगबरा भी दिल्ली में है।
इसे गुलाम बंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
इसने ग्वालियर अभियान के दौरान अपनी बागडोर अपनी बेटी रजिया के हाथ में दिया जिसके उपरान्त रजिया ने दृढता से शाशन किया जिससे खुस होकर इल्तुतमिस ने इसे अपना उत्तराधिकारी घोसित किया तथा चांदी का सिक्का जारी करवाया जिसमें हजरते रजिया उभरवाया।
रजिया सुल्तान(1236-1240)यह दिल्ली सल्तनत की पहली तथा एक मात्र महिला शासक थी।
रजिया सुल्तान के शासक बनने से दिल्ली की जनता तथा अमीर नाराज हो गये और विद्रोही हो गये।
रजिया ने सभी अमीरो से समझौता किया। एथगीन का सुबेदार तथा अल्तूनिया को तल्हिन्द का सूबेदार तथा जलालुद्दीन को अमीरो आतुर(अश्वशाला का प्रधान) घोसित किया।
1240 ई. में तलहिन्द का सूबेदार अल्तूनिया नें विद्रोह कर दिया। जिसको दबाने के लिये रजिया तलहिन्द पहुचती है जहां पर अल्तूनिया नें याकूब की हत्या करके रजिया को बन्दी बना लेता है।
जिसके बाद अल्तूनिया रजिया से विवाह करता है और फिर दिल्ली की ओर चलते है और बीच में हरियांणा के कैथल नामक स्थान पर बैरमसाह हिन्दू डकैतो व्दारा दोनो की हत्या करा देता है।
                 मुगल वंश(1526-1857)

मुगल वंश का संस्थापक बाबर था।

मुगल वंश के शाशक निम्न है।

ट्रिकBHAJSAB

Bबाबर
Aहुमायु
Jअकबर
Hजहांगीर
Sशाहजहां
Aऔरंगजेब
Bबहादुर शाह जफर
                   बाबर(1526-1530)
नाम बाबर

पिता का नामशेख मिर्जा

माता का नामकुतुलुग निगार खानम

जन्म स्थानअफगानिस्तान

मृत्यु स्थानदिल्ली

बाबर 11 वर्ष की उम्र में परगना की गद्दी पर बैठा

1504 ई. में इसने काबुल पर अधिकार कर लिया।
इसने अपनी दादी एहसान दौलत बेगम के सहयोग से अपना राज्याअभिषेक करवाया बाबर पिता की ओर से तैमूर का पांचवा और माता की ओर से चंगेज का चौदवा संन्तान था।

बाबर एक चक्तुराई तुर्क था।

बाबर का भारत पर विजय अभिमान→1519ई. मे बाबर ने अपना आक्रमण यूसिफजाई जातियो के विरुध्द किया जिसमें बाजौर और भेरा पर अधिकार कर लिया
इसका महत्व पूर्ण जो अभियान था ओ पानीपथ के प्रथम युध्द के नाम से जाता है।
पानी पथ का प्रथम युध्दपानीपथ का प्रथम युध्द 1526 ई. में बाबर एवं इब्राहिम लोधी के बीच हुआ यह पानीपथ नामक स्थान पर हुआ जिस युध्द में बाबर नें तुगलनामा युध्द पद्धति एवं उष्मानी विधि(तोपो को सजाने की विधि) से युध्द किया जिससे इसको विजय मिली।

पानीपथ के प्रथम युध्द में बाबर ने सर्वप्रथम बारुद का प्रयोग तोपो के रूप में किया।
इस युध्द को जीतने के बाद बाबर ने अपने सैनिको के एक एक चांदी का सिक्का उपहार स्वरूप दिया।

खानवा का युध्द(1527ई.)खानवा का युध्द बाबर एवं राणासांगा के बीच हुआ जिसमें बाबर की विजय हुई।

इस युध्द के जीतने के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की
बाबर नें इस युध्द में अपने सैनिको को जिहाद का नारा(धर्म के नाम पर युध्द करना) दिया जिसमें इसके सैनिक पूरी ताकत से लड़े।

 इस युध्द के समय बाबर ने मुसलमानो से तमगा कर(व्यापरिक कर)न लेने की घोसणा की।

चन्देरी का युध्द(1528ई.)यह युध्द बाबर एवं मेदनीराय के बीच लड़ा गया।
इस युध्द को भी बाबर ने जीता यह युध्द जाड़े के दिनो में लड़ा गया इस युध्द में बाबर ने राजपूतो के सिर को काटकर मिनार का निर्माण करवाया।

घाघरा का युध्द(6मई1528)इस युध्द में बाबर की सेना इक तरफ तथा दूसरी तरफ बंगाल+अफगान+बिहार की सेना थी।
इस युध्द को भी बाबर ने जीत लिया।


27दिसम्बर 1930ई. को 48वर्ष की आयु में बाबर की मृत्यु हो गई। इसे काबुल में दफनाया गया। इसका मकबरा काबुल मे है।

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